
जर्मनी की टीम विश्व कप में पेनल्टी शूटआउट में अपनी अजेयता के लिए जानी जाती थी। उन्होंने चारों मौकों पर जीत हासिल की थी और केवल एक पेनल्टी मिस की थी। गैरी लिनेकर का प्रसिद्ध कथन 'फुटबॉल एक सरल खेल है जहां 22 आदमी 90 मिनट तक गेंद का पीछा करते हैं और अंत में जर्मन हमेशा जीतते हैं' इसी परंपरा को दर्शाता है। लेकिन सोमवार शाम को यह सब बदल गया जब जूलियन नागेल्समैन की टीम फॉक्सबोरो में पैराग्वे के खिलाफ पेनल्टी शूटआउट में 4-3 से हार गई। यह जर्मनी की विश्व कप में पहली पेनल्टी शूटआउट हार थी और बड़े टूर्नामेंटों में 1976 यूरोपीय चैम्पियनशिप फाइनल के बाद दूसरी बार ऐसा हुआ।
मैच में जर्मनी ने पहले हाफ में पिछड़ने के बाद काई हावर्ट्ज के गोल से बराबरी की। अतिरिक्त समय में जोनाथन ताह ने गोल करके जीत दिलाई, लेकिन वीएआर समीक्षा में वाल्डेमार एंटोन द्वारा गोलकीपर ऑरलैंडो गिल पर फाउल पाया गया और गोल रद्द कर दिया गया। ताह ने बाद में अचानक मौत में निर्णायक पेनल्टी मिस की, जबकि हावर्ट्ज और वोल्टेमेड भी अपने प्रयासों में असफल रहे। इस हार ने जर्मनी के पेनल्टी शूटआउट के दबदबे को समाप्त कर दिया।
पैराग्वे की टीम ने शानदार प्रदर्शन किया और पेनल्टी शूटआउट में अपनी सटीकता से जीत हासिल की। उनके गोलकीपर ऑरलैंडो गिल ने महत्वपूर्ण बचत की। यह जीत पैराग्वे के लिए ऐतिहासिक थी क्योंकि उन्होंने विश्व कप में जर्मनी को हराया।
जर्मनी के लिए यह हार एक बड़ा झटका है, खासकर उनकी पेनल्टी शूटआउट विरासत को देखते हुए। कोच नागेल्समैन ने कहा कि टीम ने अच्छा खेला लेकिन पेनल्टी में भाग्य साथ नहीं दिया। इस हार से जर्मनी को भविष्य के टूर्नामेंटों के लिए सबक लेना होगा।
इस मैच ने विश्व कप के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा है। जर्मनी की पेनल्टी शूटआउट में हार ने साबित कर दिया कि कोई भी टीम अजेय नहीं है। फुटबॉल प्रशंसकों के लिए यह एक रोमांचक और अप्रत्याशित मोड़ था।
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