
वैज्ञानिकों ने पाया है कि लोगों को सही दृश्य संकेतों पर ध्यान देना सिखाने से वे AI-निर्मित चेहरों को लगभग दोगुनी सटीकता से पहचान सकते हैं। यह शोध डीपफेक और एआई-जनित छवियों के बढ़ते खतरे के बीच आया है। अध्ययन में प्रतिभागियों को प्रशिक्षित किया गया कि वे त्वचा की बनावट, आंखों की चमक और चेहरे की विषमता जैसे विवरणों पर ध्यान दें। इन संकेतों पर ध्यान केंद्रित करने से पहचान की सटीकता 50% से बढ़कर 90% से अधिक हो गई। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह प्रशिक्षण सोशल मीडिया और समाचार प्लेटफार्मों पर फर्जी खातों और गलत सूचना से निपटने में मदद कर सकता है।
प्रशिक्षण में प्रतिभागियों को वास्तविक और AI-निर्मित चेहरों की तुलना करने के लिए कहा गया। उन्हें सिखाया गया कि AI-निर्मित चेहरों में अक्सर त्वचा की बनावट बहुत चिकनी होती है और आंखों में प्राकृतिक चमक नहीं होती। इसके अलावा, कान और नाक के आकार में असमानता भी एक संकेत हो सकती है। अध्ययन में पाया गया कि प्रशिक्षण के बाद प्रतिभागी न केवल अधिक सटीक थे, बल्कि उन्होंने तेजी से निर्णय भी लिया। यह दर्शाता है कि सही ज्ञान से लोग एआई-जनित धोखे से खुद को बचा सकते हैं।
यह शोध विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि एआई-जनित चेहरे तेजी से यथार्थवादी होते जा रहे हैं। पहले के अध्ययनों में पाया गया था कि लोग अक्सर AI-निर्मित चेहरों को वास्तविक समझ लेते हैं। नए प्रशिक्षण विधियों से इस प्रवृत्ति को उलटा जा सकता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि इस तरह के प्रशिक्षण को स्कूलों और कार्यस्थलों पर लागू किया जा सकता है। इससे लोगों को डिजिटल साक्षरता में सुधार करने में मदद मिलेगी।
हालांकि, शोधकर्ता चेतावनी देते हैं कि एआई तकनीक भी तेजी से विकसित हो रही है। जैसे-जैसे जनरेटिव मॉडल बेहतर होते जाएंगे, वैसे-वैसे पहचान के संकेत भी बदल सकते हैं। इसलिए निरंतर प्रशिक्षण और अनुसंधान की आवश्यकता है। वर्तमान अध्ययन में उपयोग किए गए संकेत अभी के लिए प्रभावी हैं, लेकिन भविष्य में नए संकेतों की पहचान करनी होगी।
निष्कर्ष में, यह अध्ययन दर्शाता है कि सरल प्रशिक्षण से लोग AI-निर्मित चेहरों को पहचानने में काफी बेहतर हो सकते हैं। यह डीपफेक के खिलाफ लड़ाई में एक महत्वपूर्ण उपकरण हो सकता है। शोधकर्ता अब इस प्रशिक्षण को व्यापक रूप से उपलब्ध कराने के तरीकों पर काम कर रहे हैं।
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