
फ्रांस में एक नस्लवादी नारा 'मरीन सत्ता में, अरब कत्लखाने में' पहली बार 1 मई 2026 को रॉइफ़ियो में सुना गया। इसके बाद 5 जून को रोडेज़ में भी यही नारा दोहराया गया। इस नारे ने राजनीतिक हलचल मचा दी और कई राजनीतिक दलों, खासकर वामपंथियों ने इसकी निंदा की। हालांकि, दक्षिणपंथी और केंद्रवादी नेताओं ने भी इसकी आलोचना की। प्रेस में इस घटना को व्यापक कवरेज मिली, लेकिन टीएफ1 और फ्रांस 2 जैसे मुख्यधारा के टेलीविजन चैनलों ने अपने जेटी (समाचार बुलेटिन) में इसका उल्लेख नहीं किया।
इस नारे का सीधा संदर्भ मरीन ले पेन, जो फ्रांस की दूर-दराज़ दक्षिणपंथी राजनीतिज्ञ हैं, से जुड़ा है। यह नारा अरब समुदाय के खिलाफ हिंसा और भेदभाव को बढ़ावा देता है। इस घटना ने फ्रांस में नस्लवाद और राजनीतिक ध्रुवीकरण पर बहस को फिर से जीवित कर दिया है। कई कार्यकर्ताओं और संगठनों ने इस नारे की निंदा की और सरकार से कार्रवाई की मांग की।
राजनीतिक प्रतिक्रियाओं में वामपंथी दलों ने इसे फासीवादी और नफरत फैलाने वाला बताया। कुछ दक्षिणपंथी नेताओं ने भी इस नारे को खारिज किया, लेकिन उन्होंने इसे अलग-थलग घटना बताया। मीडिया कवरेज में प्रमुख अखबारों और ऑनलाइन पोर्टलों ने इस पर रिपोर्ट की, लेकिन टीवी चैनलों की चुप्पी ने सवाल उठाए।
इस घटना ने फ्रांसीसी मीडिया की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए हैं। आलोचकों का कहना है कि मुख्यधारा के टीवी चैनलों ने इस नस्लवादी नारे को नजरअंदाज करके इसे सामान्य बनाने में मदद की है। वहीं, समर्थकों का तर्क है कि यह एक छोटी घटना थी जिसे ज्यादा तवज्जो नहीं दी जानी चाहिए।
फ्रांस में नस्लवाद और अप्रवासी विरोधी भावना लंबे समय से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। यह नारा उसी विभाजनकारी राजनीति का हिस्सा है जो हाल के वर्षों में बढ़ी है। इस घटना ने यह भी दिखाया कि कैसे सोशल मीडिया और स्थानीय रैलियों में नफरत फैलाई जा सकती है, जबकि मुख्यधारा का मीडिया चुप रहता है।
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