
26 जून 2026 को 14वें पासपोर्ट सेवा दिवस पर विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि पासपोर्ट नागरिकता का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि केवल यात्रा दस्तावेज़ है। यह बयान ऐसे समय आया जब चुनाव आयोग 16 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची का विशेष संशोधन कर रहा है, जिसमें 3.94 लाख बूथ स्तरीय अधिकारी घर-घर जाकर मतदाताओं की नागरिकता सत्यापित कर रहे हैं। ऐसे में पासपोर्ट को नागरिकता प्रमाण न मानना एक बड़ा विरोधाभास पैदा करता है।
द प्रोब ने चार सरकारी दस्तावेज़ों की जांच की जो पासपोर्ट को नागरिकता प्रमाण मानते हैं। पहला उदाहरण गृह मंत्रालय के ओसीआई पोर्टल का है, जहां प्रश्न 7 में 'भारतीय नागरिक होने के प्रमाण' के लिए पहले दस्तावेज़ के रूप में 'भारतीय पासपोर्ट की प्रति' सूचीबद्ध है। यह पोर्टल स्पष्ट रूप से कहता है कि पासपोर्ट केवल भारतीय नागरिक को जारी किया जाता है।
दूसरा उदाहरण विदेश मंत्रालय के अपने पासपोर्ट आवेदन फॉर्म का है, जिसमें अनुलग्नक 'ई' के तहत आवेदक को शपथपूर्वक घोषणा करनी होती है कि वह भारतीय नागरिक है। झूठी घोषणा पर भारतीय न्याय संहिता के तहत आपराधिक मुकदमा चल सकता है।
तीसरा उदाहरण पासपोर्ट नियमावली 1980 का है, जिसमें पासपोर्ट को 'नागरिकता के प्रमाण' के रूप में परिभाषित किया गया है। चौथा उदाहरण नागरिकता अधिनियम 1955 का है, जिसमें पासपोर्ट को नागरिकता स्थापित करने वाले दस्तावेज़ों में शामिल किया गया है।
ये सभी दस्तावेज़ वर्तमान में सरकारी पोर्टलों पर उपलब्ध हैं और सक्रिय रूप से उपयोग किए जा रहे हैं। यह विरोधाभास बताता है कि सरकार का एक हिस्सा पासपोर्ट को नागरिकता प्रमाण मानता है जबकि दूसरा हिस्सा इसे नकारता है।
इस विरोधाभास का सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ता है, खासकर उन लोगों पर जो मतदाता सूची में अपना नाम बनवाने के लिए नागरिकता साबित करने को कहा जाता है। पासपोर्ट को नागरिकता प्रमाण न मानने से लाखों पासपोर्ट धारकों की नागरिकता पर सवाल उठ सकते हैं।
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