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कर्नाटक का PRC पुश: DK शिवकुमार की SIR से निपटने की चाल?

The Federal
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कर्नाटक सरकार ने स्थायी निवास प्रमाण पत्र (PRC) जारी करने की प्रक्रिया को पूरी तरह से डिजिटल और समयबद्ध बनाने के लिए एक व्यापक परिचालन ढांचा पेश किया है। यह कदम मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार द्वारा उठाया गया है, जो संभवतः राज्य में विशेष निवास प्रमाण पत्र (SIR) प्रणाली के प्रभाव को कम करने का प्रयास कर रहे हैं। PRC का डिजिटलीकरण नागरिकों को तेजी से और पारदर्शी तरीके से प्रमाण पत्र प्राप्त करने में मदद करेगा। इस पहल से भ्रष्टाचार और देरी की समस्या कम होने की उम्मीद है। सरकार का लक्ष्य है कि आवेदन से लेकर जारी करने तक की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन हो, जिससे लोगों को सरकारी कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें।

यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब कर्नाटक में SIR को लेकर विवाद चल रहा है। SIR एक विशेष प्रकार का निवास प्रमाण पत्र है जो कुछ समुदायों को दिया जाता है, और इसके दुरुपयोग की शिकायतें सामने आई हैं। शिवकुमार का PRC पर जोर SIR के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है, जिससे सभी नागरिकों को समान अवसर मिल सके। नई प्रणाली में आवेदन की स्थिति को ट्रैक करने की सुविधा भी होगी, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी। इसके अलावा, डिजिटल प्रमाण पत्र को आधार से जोड़ा जाएगा, जिससे फर्जी प्रमाण पत्रों पर रोक लगेगी।

सरकार ने इस ढांचे को लागू करने के लिए एक समिति का गठन किया है, जो तकनीकी और प्रशासनिक पहलुओं की देखरेख करेगी। समिति में आईटी विभाग, राजस्व विभाग और गृह विभाग के अधिकारी शामिल होंगे। यह समिति यह सुनिश्चित करेगी कि प्रणाली सुचारू रूप से काम करे और किसी भी तकनीकी खामी को दूर किया जा सके। इस पहल के लिए एक विशेष पोर्टल विकसित किया जा रहा है, जहां आवेदक अपने दस्तावेज अपलोड कर सकेंगे और शुल्क का भुगतान ऑनलाइन कर सकेंगे।

विपक्षी दलों ने इस कदम का स्वागत किया है, लेकिन साथ ही चेतावनी दी है कि डिजिटल प्रणाली में गड़बड़ी से वंचित वर्गों को परेशानी हो सकती है। उन्होंने सरकार से ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल साक्षरता बढ़ाने की मांग की है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि PRC का डिजिटलीकरण एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इसे SIR के मुद्दे से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। उनका कहना है कि दोनों प्रमाण पत्र अलग-अलग उद्देश्यों के लिए हैं और इन्हें एक-दूसरे का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।

कुल मिलाकर, यह पहल कर्नाटक में प्रशासनिक सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यदि सफल रही, तो यह अन्य राज्यों के लिए भी एक मॉडल बन सकती है। हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार इसे कितनी प्रभावी ढंग से लागू करती है और लोगों की समस्याओं का समाधान करती है। आने वाले महीनों में इस योजना के परिणाम देखने को मिलेंगे।

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