
अंगकोर सेंटर फॉर कंजर्वेशन ऑफ बायोडायवर्सिटी (ACCB) ने सफेद कंधों वाले आइबिस (white-shouldered ibis) के लिए GPS ट्रैकिंग का परीक्षण शुरू किया है। यह प्रजाति गंभीर रूप से संकटग्रस्त है और दुनिया भर में इसके 700 से भी कम वयस्क व्यक्ति बचे हैं। कंबोडिया में इसकी सबसे बड़ी आबादी पाई जाती है। ACCB ने 29 जून को घोषणा की कि इस महीने की शुरुआत में पक्षियों के पैरों पर GPS ट्रांसमीटर लगाए गए थे। ये उपकरण चेक गणराज्य के ज़ू और चेटो ज़्लिन-लेशना द्वारा दान किए गए थे और पोलैंड से यूके होते हुए कंबोडिया पहुंचे।
यह पहली बार है जब इस प्रजाति पर इस प्रकार का ट्रैकर इस्तेमाल किया गया है। शोधकर्ता कम से कम चार सप्ताह तक इनका परीक्षण कर रहे हैं, जबकि पक्षी अपने रिहाई-पूर्व बाड़ों में हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ट्रैकर ठीक से काम करें और पक्षियों को कोई असुविधा न हो। अब तक सब कुछ ठीक चल रहा है और पक्षी आगामी रिहाई के लिए तैयार हैं। यह परीक्षण प्रजातियों के संरक्षण में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
ACCB ने इसे दुनिया का पहला सफेद कंधों वाले आइबिस का जंगल में छोड़ा जाना बताया है। यह एक अविश्वसनीय उपलब्धि है जो सभी भागीदारों के समर्थन से संभव हुई है। 2023 में, ACCB ने एक और विश्व रिकॉर्ड बनाया था जब उसने कैद में सफेद कंधों वाले आइबिस का पहला चूजा पैदा किया था। यह प्रजाति मुख्य रूप से कंबोडिया के उत्तरी और पूर्वोत्तर प्रांतों में पाई जाती है, जिनमें प्रीह विहार, मोंडुलकिरी, रतनाकिरी, क्रैटी और स्टुंग ट्रेंग शामिल हैं।
इस परियोजना का उद्देश्य प्रवास मार्गों की निगरानी करना, दैनिक चारा खोजने के व्यवहार का अध्ययन करना और संरक्षण प्रयासों के लिए डेटा एकत्र करना है। GPS ट्रैकिंग से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि ये पक्षी कहाँ जाते हैं और उन्हें किन खतरों का सामना करना पड़ता है। यह जानकारी उनके आवास की रक्षा करने और संरक्षण रणनीतियों को बेहतर बनाने में सहायक होगी।
ACCB का कहना है कि यह परीक्षण प्रजातियों के संरक्षण में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। सफेद कंधों वाले आइबिस केवल ACCB और उनके संकीर्ण जंगली क्षेत्र में पाए जाते हैं। टोनले सैप झील के आसपास के बाढ़ के मैदान भी उनके आवास का हिस्सा हैं। इस परियोजना की सफलता से भविष्य में अन्य संकटग्रस्त प्रजातियों के लिए भी इसी तरह के प्रयास किए जा सकते हैं।
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