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इच्छामृत्यु: सांसदों ने अंतरात्मा की स्वतंत्रता को रौंदा

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फ्रांस में इच्छामृत्यु पर बहस ने एक नया मोड़ ले लिया है, जहां कैथोलिक चर्च के उच्च अधिकारियों ने संसद द्वारा पारित एक विधेयक की कड़ी आलोचना की है। यह विधेयक स्वास्थ्य कर्मियों को अंतरात्मा की आपत्ति का अधिकार तो देता है, लेकिन चर्च का कहना है कि इसे पूरे संस्थानों पर लागू किया जाना चाहिए, न कि केवल व्यक्तिगत डॉक्टरों और नर्सों पर। चर्च के अनुसार, यदि किसी अस्पताल या नर्सिंग होम का प्रबंधन कैथोलिक सिद्धांतों पर चलता है, तो उसे भी इच्छामृत्यु प्रदान करने से मना करने का अधिकार होना चाहिए।

इस मुद्दे पर फ्रांसीसी संसद में गहरी खाई देखी गई है, जहां धर्मनिरपेक्षता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के समर्थकों ने इस विधेयक का समर्थन किया, जबकि धार्मिक समूहों और रूढ़िवादी सांसदों ने इसका विरोध किया। कैथोलिक चर्च ने चेतावनी दी है कि यदि उनके संस्थानों को इच्छामृत्यु में भाग लेने के लिए मजबूर किया गया, तो वे अपने अस्पतालों और देखभाल गृहों को बंद करने या उन्हें छोड़ने पर विचार कर सकते हैं। इससे फ्रांस के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है, जहां कई कैथोलिक संस्थान प्रमुख स्वास्थ्य सेवा प्रदाता हैं।

विधेयक के समर्थकों का तर्क है कि अंतरात्मा की आपत्ति का अधिकार केवल व्यक्तियों को दिया जाना चाहिए, न कि संस्थानों को, क्योंकि इससे मरीजों की पसंद का अधिकार सीमित होगा। उनका कहना है कि यदि किसी अस्पताल को पूरी तरह से इच्छामृत्यु से इनकार करने की अनुमति दी गई, तो यह उन रोगियों के लिए अनुचित होगा जो इस सेवा को चाहते हैं। फ्रांस में इच्छामृत्यु पहले से ही सख्त शर्तों के तहत कानूनी है, और यह विधेयक केवल स्वास्थ्य कर्मियों के अधिकारों को स्पष्ट करने का प्रयास करता है।

कैथोलिक चर्च ने इस विधेयक को 'अंतरात्मा की स्वतंत्रता पर हमला' बताया है और इसे रोकने के लिए अपने सभी संसाधनों का उपयोग करने की कसम खाई है। फ्रांसीसी बिशप सम्मेलन ने एक बयान जारी कर कहा कि वे इस कानून के खिलाफ कानूनी चुनौती पेश करने पर विचार कर रहे हैं। इस बीच, सरकार ने कहा है कि वह चर्च की चिंताओं को सुनने को तैयार है, लेकिन वह मरीजों के अधिकारों से समझौता नहीं करेगी।

यह विवाद फ्रांस में धर्म और राज्य के बीच चल रहे तनाव को उजागर करता है। फ्रांस एक धर्मनिरपेक्ष देश है, लेकिन कैथोलिक चर्च का स्वास्थ्य सेवा में महत्वपूर्ण योगदान है। यदि यह विधेयक कानून बन जाता है, तो यह न केवल इच्छामृत्यु पर बल्कि धार्मिक संस्थानों की भूमिका पर भी एक मिसाल कायम करेगा। आने वाले हफ्तों में संसद में इस पर गहन बहस होने की उम्मीद है, और दोनों पक्ष अपनी स्थिति पर अड़े हुए हैं।

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