
डेनमार्क के टिल्स्ट में एक स्कूल के प्रिंसिपल ने लड़कों पर सामाजिक नियंत्रण के मुद्दे को उठाया है, जिस पर अक्सर चर्चा नहीं होती। यह समस्या लड़कियों पर नियंत्रण के समान ही गंभीर है, लेकिन इसे कम ही पहचाना जाता है। स्कूल में ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ लड़के अपने चचेरे भाई-बहनों की निगरानी करते हैं या परिवार के सम्मान के लिए झगड़ों में शामिल हो जाते हैं। यह व्यवहार अक्सर सांस्कृतिक और पारिवारिक दबावों से उपजता है, जो लड़कों को कुछ खास भूमिकाओं में बांधता है। शिक्षकों के लिए यह चुनौतीपूर्ण है क्योंकि वे इन मुद्दों को संवेदनशीलता से संभालना चाहते हैं, लेकिन उनके पास पर्याप्त प्रशिक्षण या संसाधन नहीं हैं।
प्रिंसिपल का कहना है कि लड़कों पर सामाजिक नियंत्रण अक्सर लड़कियों की तुलना में अलग रूप में प्रकट होता है। जहाँ लड़कियों को उनके कपड़ों या व्यवहार के लिए नियंत्रित किया जाता है, वहीं लड़कों को उनकी मर्दानगी और परिवार की रक्षा के नाम पर नियंत्रित किया जाता है। यह नियंत्रण उन्हें भावनाओं को दबाने और आक्रामकता दिखाने के लिए प्रेरित करता है। स्कूल में ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ लड़कों ने अपनी बहनों या चचेरी बहनों की गतिविधियों पर नज़र रखी, और अगर उन्हें कुछ अनुचित लगा, तो वे परिवार के बड़ों को सूचित करते हैं। यह एक ऐसा माहौल बनाता है जहाँ लड़के खुद को पुलिस की भूमिका में पाते हैं, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।
एक और उदाहरण में, एक लड़के को अपने चचेरे भाई के साथ स्कूल के मैदान में झगड़े में शामिल होने के लिए मजबूर किया गया, क्योंकि उसे बताया गया कि यह एक 'पारिवारिक मामला' है। इस तरह की घटनाएँ लड़कों को ऐसे संघर्षों में धकेल देती हैं जिनसे वे बचना चाहते हैं, लेकिन सामाजिक दबाव उन्हें मजबूर करता है। शिक्षकों ने देखा है कि कुछ लड़के जीव विज्ञान की कक्षा के दौरान किताबें बंद कर देते हैं और पीछे हट जाते हैं, जब विषय संवेदनशील हो जाता है। यह दर्शाता है कि वे कितने असहज हैं, लेकिन वे अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाते।
प्रिंसिपल का मानना है कि इस मुद्दे को हल करने के लिए स्कूलों को अधिक संवाद और जागरूकता की आवश्यकता है। शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि वे लड़कों पर सामाजिक नियंत्रण के संकेतों को पहचानें और उचित हस्तक्षेप करें। साथ ही, माता-पिता और समुदाय के साथ मिलकर काम करना ज़रूरी है ताकि लड़कों को भी लड़कियों की तरह ही समर्थन मिल सके। यह केवल स्कूल की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि पूरे समाज को इस मुद्दे पर ध्यान देना चाहिए।
अंत में, प्रिंसिपल ने कहा कि लड़कों पर सामाजिक नियंत्रण एक छिपी हुई समस्या है जिसे अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। लड़कियों के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने के कारण, लड़कों की पीड़ा को अनदेखा किया जाता है। यह समय है कि हम इस असंतुलन को ठीक करें और सभी बच्चों को एक सुरक्षित और स्वतंत्र वातावरण प्रदान करें, जहाँ वे बिना किसी दबाव के अपनी पहचान विकसित कर सकें।
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